यह पौधा उष्णकटिबंधीय एवं उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पाया जाता है। भारत में शुष्क एवं अर्ध-शुष्क प्रदेशों की परती भूमि, सड़कों के किनारे तथा खुले स्थानों पर उगता है।
कृमिनाशक (Anthelmintic)
रेचक (Purgative)
त्वचा रोगों में (Skin diseases)
व्रण शोधन एवं रोपण (Wound healing)
शोथ, व्रण, वायुविकारों में लाभकारी
जोड़ों के दर्द, गठिया, वायुविकार में बाह्य प्रयोग
बीज तेल रेचक एवं वातव्याधि में उपयोगी
Useful Part
पत्ते
बीज
दूधनुमा रस (Latex)
Doses
बीज चूर्ण – 250–500 mg
बीज तेल – 2–5 बूँद (सावधानीपूर्वक)
पत्तों का रस – 5–10 ml
Important Formulation
व्याघ्रएरंड तेल
कृमिघ्न योगों में उपयोग
व्रणोपचार हेतु लेप